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Wednesday, December 25, 2013

ह्वेनसांग स्मृति संग्रहालय - सत्यजित मौर्य

नालंदा में रिक्शेवाले से ह्वेनसांग का नाम ठीक तरह उच्चारित नहीं हो रहा था। उसनें कहा कि “यहाँ हंसवांग का महल है”। मैं मुस्कुरा दिया, मैंने पूछा कि “जानते हो कौन था यह ह्वेनसांग (हंसवांग)?” अब कि मुस्कुराने की बारी रिक्शावाले की थी बोला “साहब यह तो आप ही जानो, हम तो आपलोगो को जानते हैं। जहाँ बोलते हो घुमा देते हैं”। “लेकिन भाई यह महल नहीं है, म्यूज़ियम है”। रिक्‍शेवाला फिर बोला “म्यूझिम होगा लेकिनदेखने में तो महल ही लगता है”। रिक्शेवाले नें अपनी विवेचना भरे तर्क सामने रख दिये जब उस म्‍युझिम को देखा तो किसी महल से कम नही था, वास्‍तविक आमजनता के अपने तर्क और उसकि आवाज होती है जो अकेडमिक दुनिया के विध्‍वानों को भी पिछें छोड देते है। चीनी सरकार के सहयोग से निर्मित यह एक भव्य, स्वच्छ तथा सुनियोजित तरीके से निर्मित संग्रहालय है जिसके माध्यम से ह्वेनसांग को याद किया गया है। ह्वेनसांग स्मृति संग्रहालय पहुँच कर मन प्रसन्नता से भर उठा। वह एक यात्री, एक विद्यार्थी, एक शिक्षक और एक इतिहासकार जिसने प्रबुध्‍द भारत के विरासत को संभालकर चिन ले गया आज उसके सभाले हुये विरासत ने हमें इतना कुछ दिया कि अकल्पनातीत है उसकी स्मृति को ठीक इसी तरह संरक्षित किये जाने की आवश्यकता थी।

'विक्रमोर्वशीय' इस संस्कृत शब्द का प्रयोग होना चाहिए था 'विक्रममौर्यवंशीय'। - सत्यजित मौर्य

कालिदास का एक नाटक है जिसका नाम है 'विक्रमोर्वशीय' और इस संस्कृत शब्द का इतिहासकारो ने 'विक्रम' नाम से प्रयोग किया,वास्तविक 'विक्रमोर्वशीय' इस संस्कृत शबद का प्रयोग होना चाहिए था 'विक्रममौर्यवंशीय'। लेकिन प्रयोग हुवाँ काल्पनिक विक्रमादित्य, नाम के राजा से और जनमानस के मन-मानस में ठूस दिया गया। अल बेरुनी एक अरबी यात्री था जिसने भारत में रहकर गणित और ज्योतिविज्ञान और संस्कृत का अध्यन किया था। इनके प्रमाणिकता को आधार माने तो अलबेरुनी की रचनाओं में कहा गया है
की हर्ष नाम का राजा था और इन्होने हूणों और शंकों का पराभव किया था, और जिसकी उपाधि विक्रमादित्य थी। बौद्ध प्रमाणित अनुश्रुतियो के अध्यन से यह तो स्पष्ट है की हर्षवर्धन मध्ययुग में बौद्ध सम्राट था और यह विजयवर्धन के वंशोजो में एक था और विजयवर्धन, खोतान का बौद्ध राजा था। सम्राट अशोक का पुत्र कुनाल ने खोतान को बसाया था और कुनाल के परिवार से विजयावर्धन के पारिवारिक सबंध थे।

कहा जाता है की विक्रमादित्य के राजदरबार के नव रत्नों में कालिदास नाम के एक कवी हुवा करते थे। इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के एतिहासिकता की खोजबीन की है और स्पष्ट रूप से कहा है की विक्रमादित्य नाम का राजा धरती पर कभी हुवाँ ही नहीं और यह भी स्पष्ट शब्दों में कहा है की विक्रमादित्य यह राजा नहीं बल्कि यह उपाधि का नाम है। इसी प्रकार ईसा की पहली शताब्दी में कनिष्क के राज्यकाल में अश्वघोष नाम के बौद्ध भिक्षु थे, इनकी रचनाएं, कवितायें और काव्यों का प्रभाव जनमानस पर रहा है। और कालिदास के कालनिर्णय में अश्वघोष का उल्लेख है इतिहासकारों का मानना है की कालिदास ने अश्वघोष के रचनाओं की नक़ल की है और विभिन्नय संस्कृत के काव्यों रचनाओं में कालिदास ने अपना नाम गाड़ दिया। इसका प्रमाण कालिदास द्वारा रचित 'विक्रमोर्वशीय' के चौथे अंक में पाली-प्राकृत के सुत्त है।

एक फग्युर्सन नाम का विद्वान है, जिन्होंने अल बेरुनी के किताबो का तर्क देकर यह कहा है की विक्रमादित्य यह उपाधि हर्ष की थी। और हर्षवर्धन ने अपने विजय की स्मुर्ती को स्थाई बनाने के लिए एक सवंत (कैलेण्डर) चलाया था। हर्षवर्धन के इतिहासिक सत्य को काल्पनिक रंग देने के लिए वर्धन हटाकर हर्ष रखा गया और हर्षवर्धन के सवंत को विक्रमसवंत सवंत का नाम देकर इसका शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 दिया गया ताकि हर्षवर्धन की एतिहासिक सच्चाई काल्पनिक विक्रमादित्य के नाम से जनमानस में मनमानस में ठुसी जाए ! इस प्रकार से हर्षवर्धन के सवंत को शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 देकर विक्रमसवंत को हर्षवर्धन के कार्यकाल से पीछे धकेला गया इसलिए इस विक्रमसवंत के शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। जैसे बुद्ध निर्वाण सवंत के शून्य बिंदु का आधार बुद्ध का महापरिनिर्वाण दिन है। ऐसा आधार विक्रमसवंत का नहीं है। सम्राट अशोक ने 256 पडाव के रात्री विश्राम बीत चुके है यह रघुनाथ के शिलालेख में कहा है और यह 256 रात्रि माया के कैलेण्डर से 260 दिन के वर्ष से मिलते जुलते है और 256 के रात्रि के पड़ाव के नक्षत्र 9 होते है.......।

डॉ. अमर्त्य सेन ने स्पष्ट कहा है की विक्रमसवंत की आधिकारिक की पुष्टि करना और समय के व्यवहार में इसकी एतिहासिकता के ठोस प्रमाण नहीं है। डॉ. अमर्त्य सेन के प्रमाणों को ठोस प्रमाण मानते है तो यह भी स्पष्ट होता है की आर्य भट्ट जिन्होंने कलिसवंत को चलाया और इस कलिसवंत का शून्य बिंदु 78 ईसवी शंक सवंत का शून्य बिंदु है और यह शून्य बिंदु बौद्ध सम्राट कनिष्क का है, क्योंकि शंक सवंत बौद्ध सम्राट कनिष्क ने सुरु किया था। इस दृष्टी से महास्थविर वज्रबोधी के शिष्य चीनी भिख्कू ई-शिंग जिन्होंने गणित और ज्योतिविज्ञान की रचना की थी और वर्ष की अवधि 365.25636 दिन आकलित किया है। कलिसवंत के निर्माता आर्य भट्ट और विहिरामिर, इन्ही के निर्मित कलिसवंत से यह स्पष्ट होता है की आर्य भट्ट और विहिरामिर यह महास्थविर वज्रबोधी के शिष्य चीनी भिख्कू ई-शिंग के बाद के होते है। समय और तिथिगणना के पुराने पाली-प्राकृत के ग्रन्थ बच पाते तो इन सवंत (कैलेण्डर) की खोजबिन में पता चलता संस्कृत साहित्य की जड़ें गहरी है या नहीं ! कभी-कभी सोचता हूँ की इन काल और तिथिगणना के सवंत (कैलेण्डर) में समय बर्बाद करके कुछ ख़ास व्यवहारीक दृष्टी से जनमानस को लाभ होने वाला नही है। लेकिन इसे एक लाभ है की ब्राम्हणवर्ग के लोगो ने बौद्ध साहित्यों की नक़ल संस्कृत में करके अपने नाम गाड़ दिए है और अपने जन्म तिथियों को बौद्ध सम्राटो के कार्यकाल से पहले धकेला और जनमानस को गुमराह किया यह सत्य है .......

Asoka Pillar in Chin ( Fujian Province) - by Satyajit Mourya

Asoka Pillar in Chin ( Fujian Province) 

ईरान यह आधुनिक ईरानियों ने बसाया इसके अवशेष प्रमाण ईरानियों के पास नहीं है! बल्कि पूर्वी ईरान मुख्य रूप से बैक्ट्रिया से सबंधित था! (Bactria present-day Afghanistan) बुद्ध के पछ्यात यह क्षेत्र सम्राट अशोक के प्रबुद्ध भारत के सीमाओं के अधीन थी ! बुद्ध के बुद्धत्व प्राप्ति के सातवे सप्ताह में लघभग 1200 किलोमीटर के निर्जन पहाड़ियो को चीरकर बैक्ट्रिया (Bactria present-day Afghanistan) से दो व्यापारी तप्पसु और भल्लिक वर्त्तमान बौद्ध गया में बुद्ध को मिले थे! और बुद्ध ने उन्हें अपने आठ केषधातु दिए थे, इन दो व्यापारियो में दुनिया का प्राचीन शहर बल्ख में स्तूप का निर्माण किया था! और इसके ठोस प्रमाण आज भी बल्ख पुरातात्विक रिकॉर्ड में सुरक्षित है! इसी प्रकार अरब,खोतान, साइबेरिया, काशगर, कूचा, अफगानिस्ता, मध्‍यपूर्व और पश्चिम एशिया, फारस, फिलिस्‍तीन, इसराईल के हर चप्पे को छान कर देखा कि बुद्ध के हयात में इन क्षेत्रो में बुद्ध कि मानव जीवनमूल्यो को विकसति करने वाली शिक्षा का संचारण बौद्ध भिक्खुओं ने किया था यह मात्र भारत के ही नहीं थे बल्कि स्थानिक भी थे!

बुद्ध के हयात में महास्थविर पुन्ना सीरिया जाकर मध्‍यपूर्व और पश्चिम एशिया, फारस, फिलिस्‍तीन, इसराईल में बुध्‍द के शिक्षा को संचारित किया था और अभयारण्यों में चार बौद्ध विहारों की स्थापना की गयी थी। आज भी यहूदी हिब्रू शिक्षाविदी संप्रदाय ने महास्थविर भदन्त पुन्ना (Punna) के मूल्यवान बौध्‍द दस्तावेज़ों को अपने गुफा आवास में आधी सदी से जनता और अकादमिक दुनिया से दुर रखकर यहूदी हिब्रू विद्वानों ने अपने पास रखा है। यह भी जानता हूँ कि हमारे पास इन दस्ताएवजो को लाने के लिए संसाधनो का अभाव है! तभी इससे यह पता चलता है कि शाक्‍यमुनी बुद्ध के जीवन हयात में अरब के मरुभूमि में कभी बुद्ध के धम्म का सितार चमकता था!

विश्व महान सम्राट अशोक कि जयंती 7 अप्रैल 2014 को - सत्यजित मौर्य

प्रबुद्ध भारत का नूर भी आयेंगा जर्रे जर्रे पर!
संसार के सिरमौर प्रबुद्ध भारत के साम्राज्य का विश्व महान सम्राट अशोक कि जयंती 7 अप्रैल 2014 को आएँगी ! पिछले तिन साल से मेरे मन-मानस में सम्राट अशोक के प्रबुद्ध भारत के साम्राज्य के ऎश्वर्य-वैभव और अवशेषो कि खोज का जूनून था! और मुझे इंतज़ार था की सम्राट अशोक के अवशेष कहा होंगे? आखिर वह अवशेष चीन देश के Buddhist Temple of Famen-si, at Fufeng County में मिल हि गए और इस बौध्‍द विहार कि छबी आप देख रहे हो इसे 'सम्राट अशोक विहार' कहा जाता है! अब यह देखा जायेंगा कि सम्राट अशोक के अवशेष यहा आये कैसे और इसका रहस्य क्या है..... इसकी गुत्थी सुलझाने का काम 'कूचा' (खोतान) के सिल्क रोड पर 'प्राचीन बौध्‍द स्तूप' सेतु का काम करेंगे...

विश्व महान सम्राट अशोक कि जयंती 7 अप्रैल 2014 को आएँगी ! - सत्यजित मौर्य

विश्व महान सम्राट अशोक कि जयंती 7 अप्रैल 2014 को आएँगी ! - सत्यजित मौर्य


***सम्राट अशोक और दुनिया के सम्राट***
सिंकन्दतर कि ज्यो-ज्यो शक्ती‍ बडती गयी त्यो-त्यो वह अनैतिक कार्य बडते गये, यह खुब शराब पीता था और निदर्यतापर्ण प्रजा की हत्या करता था। और चल बसते ही इनका साम्राज्य तुकडो में बट गया! इसका विश्व मानव जाती को स्था्ई देन नही है। चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक कि विश्व मानव जाती को स्था्ई देन है!

सिजर, अपनी शक्ति का उपयोंग विश्वकजगत के मानव समुदाय के लिये कर सकता था। लेकिन सिजर, ने अपने चौपन वर्ष कि उम्र में मिस्र कि क्लियोपेट्रा के साथ रंग-रेलिया मनाने में व्यस्थ था और सीजर अपने ही साम्राज्य के लोगो के जीवनमूल्य विकसित करने में श्रेष्ट नहीं रहा है। सम्राट अशोक को भले ही पाच अर्धांगिया थी लेकिन मानवजगत के जीवनमूल्य विकसित करने में सम्राट अशोक का योगदान अमूल्य है!

नेपोलियन मानव कल्याण करके विश्वजगत को सुर्य बना देता’ भले ही उसने अपने देश का कितना भी भला किया हो लेकीन विश्वजगत मानव कल्यान के प्रति उसके आभार प्रायः शून्य है। सम्राट अशोक का विश्वजगत के भलाई में अग्र स्थान है!

कॉन्टेसनटाइन ने इसाईयों के बाईबल के नितीशास्त्र् को अपनाकर प्रचार किया था लेकिन इस का रास्ता सम्राट अशोक के प्रबुद्व भारत से ही आता है। कॉन्टेसनटाइन के समय रोमन साम्राज्य् में बाईबल का नितीशास्त्र काफी लोकप्रिय हो चुका था। कॉन्टेनटाइन ने अपने अंतिम दिनों में प्रतिक्रीयावादी होकर पेगनवाद की ओर दन्मु‍ख होने से इसाईयों में भ्रम पैदा हुआ और गिरवाट भी देखी गई। सम्राट अशोक के साम्राज्य में इस प्रकार भ्रांतिया दिखाई नहीं देती!

रोमन सम्राट मार्कस ओरेलियस एंटोनियस, बाईबल के नितीशास्त्र के प्रचार को रोमन साम्राज्य के उन्नती के लिये घातक समझता था। और इसने ईसाईयों पर व्यकक्तीटगत ढंग से अत्याचार भी किये। सम्राट अशोक, ने बुद्ध के शिक्षा के प्रचार में धार्मिक कट्टरता या असहिष्णूता नही थी।

अकबर ने अपने समय राजकीय स्तर पर सर्वधर्म सम्मेलन आयोजन करवाया था। इस सम्मेलन की प्रेरना स्त्रोत अशोक के ई.पू. तिसरी सदी में आयोजीत सम्मेलन ही रहा है। अकबर ने ‘दिने-इलाही’ नामक नया सम्रादाय चलाया लेकिन इस ‘दिने-इलाही’ कि अहिंसा की मुल धारा भी बुद्व के सिद्वान्त से ही बहती थी। अकबर मे सम्राट अशोक के जैसी नैतिक आचार संहिता को प्रबलता के साथ लागू करने में उत्साह नही था। इसी कारण उसके ‘दिने-इलाही’ नाम के सिद्वान्त उसके राज दरबार के बाहर नही पनप सके और अकबर के म़त्यृ के साथ ही समाप्त हो गये।

अरस्तूर ने स्वततन्त्रा के महत्वका प्रतिपादन अश्वय किया था, लेकिय इन्होने भी महिला और कमजोर वर्गा को उनके स्वावतन्त्र धिकार के परिधी से बहार ही रखा था। हम ठोस दावे के साथ कहते है की महिलाओ के स्वातन्त्र याधिकार के प्रति स्वातंत्रता और सहिष्णुकता की देन बुद्ध से आती है। इस दृष्टी से पश्चिमी संस्कृती का दावा कराना वास्तविक निराधार ही है। और प्लेटो या सेंट ऑगस्टाइन और कंफयूशियस यह महिला और कमजोर वर्गा को उनके स्वावतन्त्र धिकार के परिधी के अधिकारो को लेकर सम्राट अशोक से बेहतर सहिष्णुत दिखाई नहीं देते।

मध्य एशिया, खोतान, कूचा, काशगर में सम्राट अशोक का नाम अक्सू (Aksu ) है ! - By Satyajit Mourya

मध्य एशिया, खोतान, कूचा, काशगर में सम्राट अशोक का नाम अक्सू (Aksu ) है !
In Central Asha, Khotan, kucha, Kashagr, The Great emperor Ashoka, name is Aksu!