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Wednesday, December 25, 2013

'विक्रमोर्वशीय' इस संस्कृत शब्द का प्रयोग होना चाहिए था 'विक्रममौर्यवंशीय'। - सत्यजित मौर्य

कालिदास का एक नाटक है जिसका नाम है 'विक्रमोर्वशीय' और इस संस्कृत शब्द का इतिहासकारो ने 'विक्रम' नाम से प्रयोग किया,वास्तविक 'विक्रमोर्वशीय' इस संस्कृत शबद का प्रयोग होना चाहिए था 'विक्रममौर्यवंशीय'। लेकिन प्रयोग हुवाँ काल्पनिक विक्रमादित्य, नाम के राजा से और जनमानस के मन-मानस में ठूस दिया गया। अल बेरुनी एक अरबी यात्री था जिसने भारत में रहकर गणित और ज्योतिविज्ञान और संस्कृत का अध्यन किया था। इनके प्रमाणिकता को आधार माने तो अलबेरुनी की रचनाओं में कहा गया है
की हर्ष नाम का राजा था और इन्होने हूणों और शंकों का पराभव किया था, और जिसकी उपाधि विक्रमादित्य थी। बौद्ध प्रमाणित अनुश्रुतियो के अध्यन से यह तो स्पष्ट है की हर्षवर्धन मध्ययुग में बौद्ध सम्राट था और यह विजयवर्धन के वंशोजो में एक था और विजयवर्धन, खोतान का बौद्ध राजा था। सम्राट अशोक का पुत्र कुनाल ने खोतान को बसाया था और कुनाल के परिवार से विजयावर्धन के पारिवारिक सबंध थे।

कहा जाता है की विक्रमादित्य के राजदरबार के नव रत्नों में कालिदास नाम के एक कवी हुवा करते थे। इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के एतिहासिकता की खोजबीन की है और स्पष्ट रूप से कहा है की विक्रमादित्य नाम का राजा धरती पर कभी हुवाँ ही नहीं और यह भी स्पष्ट शब्दों में कहा है की विक्रमादित्य यह राजा नहीं बल्कि यह उपाधि का नाम है। इसी प्रकार ईसा की पहली शताब्दी में कनिष्क के राज्यकाल में अश्वघोष नाम के बौद्ध भिक्षु थे, इनकी रचनाएं, कवितायें और काव्यों का प्रभाव जनमानस पर रहा है। और कालिदास के कालनिर्णय में अश्वघोष का उल्लेख है इतिहासकारों का मानना है की कालिदास ने अश्वघोष के रचनाओं की नक़ल की है और विभिन्नय संस्कृत के काव्यों रचनाओं में कालिदास ने अपना नाम गाड़ दिया। इसका प्रमाण कालिदास द्वारा रचित 'विक्रमोर्वशीय' के चौथे अंक में पाली-प्राकृत के सुत्त है।

एक फग्युर्सन नाम का विद्वान है, जिन्होंने अल बेरुनी के किताबो का तर्क देकर यह कहा है की विक्रमादित्य यह उपाधि हर्ष की थी। और हर्षवर्धन ने अपने विजय की स्मुर्ती को स्थाई बनाने के लिए एक सवंत (कैलेण्डर) चलाया था। हर्षवर्धन के इतिहासिक सत्य को काल्पनिक रंग देने के लिए वर्धन हटाकर हर्ष रखा गया और हर्षवर्धन के सवंत को विक्रमसवंत सवंत का नाम देकर इसका शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 दिया गया ताकि हर्षवर्धन की एतिहासिक सच्चाई काल्पनिक विक्रमादित्य के नाम से जनमानस में मनमानस में ठुसी जाए ! इस प्रकार से हर्षवर्धन के सवंत को शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 देकर विक्रमसवंत को हर्षवर्धन के कार्यकाल से पीछे धकेला गया इसलिए इस विक्रमसवंत के शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। जैसे बुद्ध निर्वाण सवंत के शून्य बिंदु का आधार बुद्ध का महापरिनिर्वाण दिन है। ऐसा आधार विक्रमसवंत का नहीं है। सम्राट अशोक ने 256 पडाव के रात्री विश्राम बीत चुके है यह रघुनाथ के शिलालेख में कहा है और यह 256 रात्रि माया के कैलेण्डर से 260 दिन के वर्ष से मिलते जुलते है और 256 के रात्रि के पड़ाव के नक्षत्र 9 होते है.......।

डॉ. अमर्त्य सेन ने स्पष्ट कहा है की विक्रमसवंत की आधिकारिक की पुष्टि करना और समय के व्यवहार में इसकी एतिहासिकता के ठोस प्रमाण नहीं है। डॉ. अमर्त्य सेन के प्रमाणों को ठोस प्रमाण मानते है तो यह भी स्पष्ट होता है की आर्य भट्ट जिन्होंने कलिसवंत को चलाया और इस कलिसवंत का शून्य बिंदु 78 ईसवी शंक सवंत का शून्य बिंदु है और यह शून्य बिंदु बौद्ध सम्राट कनिष्क का है, क्योंकि शंक सवंत बौद्ध सम्राट कनिष्क ने सुरु किया था। इस दृष्टी से महास्थविर वज्रबोधी के शिष्य चीनी भिख्कू ई-शिंग जिन्होंने गणित और ज्योतिविज्ञान की रचना की थी और वर्ष की अवधि 365.25636 दिन आकलित किया है। कलिसवंत के निर्माता आर्य भट्ट और विहिरामिर, इन्ही के निर्मित कलिसवंत से यह स्पष्ट होता है की आर्य भट्ट और विहिरामिर यह महास्थविर वज्रबोधी के शिष्य चीनी भिख्कू ई-शिंग के बाद के होते है। समय और तिथिगणना के पुराने पाली-प्राकृत के ग्रन्थ बच पाते तो इन सवंत (कैलेण्डर) की खोजबिन में पता चलता संस्कृत साहित्य की जड़ें गहरी है या नहीं ! कभी-कभी सोचता हूँ की इन काल और तिथिगणना के सवंत (कैलेण्डर) में समय बर्बाद करके कुछ ख़ास व्यवहारीक दृष्टी से जनमानस को लाभ होने वाला नही है। लेकिन इसे एक लाभ है की ब्राम्हणवर्ग के लोगो ने बौद्ध साहित्यों की नक़ल संस्कृत में करके अपने नाम गाड़ दिए है और अपने जन्म तिथियों को बौद्ध सम्राटो के कार्यकाल से पहले धकेला और जनमानस को गुमराह किया यह सत्य है .......

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