विश्व महान सम्राट अशोक कि जयंती 7 अप्रैल 2014 को आएँगी ! - सत्यजित मौर्य
***सम्राट अशोक और दुनिया के सम्राट***
सिंकन्दतर कि ज्यो-ज्यो शक्ती बडती गयी त्यो-त्यो वह अनैतिक कार्य बडते गये, यह खुब शराब पीता था और निदर्यतापर्ण प्रजा की हत्या करता था। और चल बसते ही इनका साम्राज्य तुकडो में बट गया! इसका विश्व मानव जाती को स्था्ई देन नही है। चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक कि विश्व मानव जाती को स्था्ई देन है!
सिजर, अपनी शक्ति का उपयोंग विश्वकजगत के मानव समुदाय के लिये कर सकता था। लेकिन सिजर, ने अपने चौपन वर्ष कि उम्र में मिस्र कि क्लियोपेट्रा के साथ रंग-रेलिया मनाने में व्यस्थ था और सीजर अपने ही साम्राज्य के लोगो के जीवनमूल्य विकसित करने में श्रेष्ट नहीं रहा है। सम्राट अशोक को भले ही पाच अर्धांगिया थी लेकिन मानवजगत के जीवनमूल्य विकसित करने में सम्राट अशोक का योगदान अमूल्य है!
नेपोलियन मानव कल्याण करके विश्वजगत को सुर्य बना देता’ भले ही उसने अपने देश का कितना भी भला किया हो लेकीन विश्वजगत मानव कल्यान के प्रति उसके आभार प्रायः शून्य है। सम्राट अशोक का विश्वजगत के भलाई में अग्र स्थान है!
कॉन्टेसनटाइन ने इसाईयों के बाईबल के नितीशास्त्र् को अपनाकर प्रचार किया था लेकिन इस का रास्ता सम्राट अशोक के प्रबुद्व भारत से ही आता है। कॉन्टेसनटाइन के समय रोमन साम्राज्य् में बाईबल का नितीशास्त्र काफी लोकप्रिय हो चुका था। कॉन्टेनटाइन ने अपने अंतिम दिनों में प्रतिक्रीयावादी होकर पेगनवाद की ओर दन्मुख होने से इसाईयों में भ्रम पैदा हुआ और गिरवाट भी देखी गई। सम्राट अशोक के साम्राज्य में इस प्रकार भ्रांतिया दिखाई नहीं देती!
रोमन सम्राट मार्कस ओरेलियस एंटोनियस, बाईबल के नितीशास्त्र के प्रचार को रोमन साम्राज्य के उन्नती के लिये घातक समझता था। और इसने ईसाईयों पर व्यकक्तीटगत ढंग से अत्याचार भी किये। सम्राट अशोक, ने बुद्ध के शिक्षा के प्रचार में धार्मिक कट्टरता या असहिष्णूता नही थी।
अकबर ने अपने समय राजकीय स्तर पर सर्वधर्म सम्मेलन आयोजन करवाया था। इस सम्मेलन की प्रेरना स्त्रोत अशोक के ई.पू. तिसरी सदी में आयोजीत सम्मेलन ही रहा है। अकबर ने ‘दिने-इलाही’ नामक नया सम्रादाय चलाया लेकिन इस ‘दिने-इलाही’ कि अहिंसा की मुल धारा भी बुद्व के सिद्वान्त से ही बहती थी। अकबर मे सम्राट अशोक के जैसी नैतिक आचार संहिता को प्रबलता के साथ लागू करने में उत्साह नही था। इसी कारण उसके ‘दिने-इलाही’ नाम के सिद्वान्त उसके राज दरबार के बाहर नही पनप सके और अकबर के म़त्यृ के साथ ही समाप्त हो गये।
अरस्तूर ने स्वततन्त्रा के महत्वका प्रतिपादन अश्वय किया था, लेकिय इन्होने भी महिला और कमजोर वर्गा को उनके स्वावतन्त्र धिकार के परिधी से बहार ही रखा था। हम ठोस दावे के साथ कहते है की महिलाओ के स्वातन्त्र याधिकार के प्रति स्वातंत्रता और सहिष्णुकता की देन बुद्ध से आती है। इस दृष्टी से पश्चिमी संस्कृती का दावा कराना वास्तविक निराधार ही है। और प्लेटो या सेंट ऑगस्टाइन और कंफयूशियस यह महिला और कमजोर वर्गा को उनके स्वावतन्त्र धिकार के परिधी के अधिकारो को लेकर सम्राट अशोक से बेहतर सहिष्णुत दिखाई नहीं देते।
***सम्राट अशोक और दुनिया के सम्राट***
सिंकन्दतर कि ज्यो-ज्यो शक्ती बडती गयी त्यो-त्यो वह अनैतिक कार्य बडते गये, यह खुब शराब पीता था और निदर्यतापर्ण प्रजा की हत्या करता था। और चल बसते ही इनका साम्राज्य तुकडो में बट गया! इसका विश्व मानव जाती को स्था्ई देन नही है। चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक कि विश्व मानव जाती को स्था्ई देन है!
सिजर, अपनी शक्ति का उपयोंग विश्वकजगत के मानव समुदाय के लिये कर सकता था। लेकिन सिजर, ने अपने चौपन वर्ष कि उम्र में मिस्र कि क्लियोपेट्रा के साथ रंग-रेलिया मनाने में व्यस्थ था और सीजर अपने ही साम्राज्य के लोगो के जीवनमूल्य विकसित करने में श्रेष्ट नहीं रहा है। सम्राट अशोक को भले ही पाच अर्धांगिया थी लेकिन मानवजगत के जीवनमूल्य विकसित करने में सम्राट अशोक का योगदान अमूल्य है!
नेपोलियन मानव कल्याण करके विश्वजगत को सुर्य बना देता’ भले ही उसने अपने देश का कितना भी भला किया हो लेकीन विश्वजगत मानव कल्यान के प्रति उसके आभार प्रायः शून्य है। सम्राट अशोक का विश्वजगत के भलाई में अग्र स्थान है!
कॉन्टेसनटाइन ने इसाईयों के बाईबल के नितीशास्त्र् को अपनाकर प्रचार किया था लेकिन इस का रास्ता सम्राट अशोक के प्रबुद्व भारत से ही आता है। कॉन्टेसनटाइन के समय रोमन साम्राज्य् में बाईबल का नितीशास्त्र काफी लोकप्रिय हो चुका था। कॉन्टेनटाइन ने अपने अंतिम दिनों में प्रतिक्रीयावादी होकर पेगनवाद की ओर दन्मुख होने से इसाईयों में भ्रम पैदा हुआ और गिरवाट भी देखी गई। सम्राट अशोक के साम्राज्य में इस प्रकार भ्रांतिया दिखाई नहीं देती!
रोमन सम्राट मार्कस ओरेलियस एंटोनियस, बाईबल के नितीशास्त्र के प्रचार को रोमन साम्राज्य के उन्नती के लिये घातक समझता था। और इसने ईसाईयों पर व्यकक्तीटगत ढंग से अत्याचार भी किये। सम्राट अशोक, ने बुद्ध के शिक्षा के प्रचार में धार्मिक कट्टरता या असहिष्णूता नही थी।
अकबर ने अपने समय राजकीय स्तर पर सर्वधर्म सम्मेलन आयोजन करवाया था। इस सम्मेलन की प्रेरना स्त्रोत अशोक के ई.पू. तिसरी सदी में आयोजीत सम्मेलन ही रहा है। अकबर ने ‘दिने-इलाही’ नामक नया सम्रादाय चलाया लेकिन इस ‘दिने-इलाही’ कि अहिंसा की मुल धारा भी बुद्व के सिद्वान्त से ही बहती थी। अकबर मे सम्राट अशोक के जैसी नैतिक आचार संहिता को प्रबलता के साथ लागू करने में उत्साह नही था। इसी कारण उसके ‘दिने-इलाही’ नाम के सिद्वान्त उसके राज दरबार के बाहर नही पनप सके और अकबर के म़त्यृ के साथ ही समाप्त हो गये।
अरस्तूर ने स्वततन्त्रा के महत्वका प्रतिपादन अश्वय किया था, लेकिय इन्होने भी महिला और कमजोर वर्गा को उनके स्वावतन्त्र धिकार के परिधी से बहार ही रखा था। हम ठोस दावे के साथ कहते है की महिलाओ के स्वातन्त्र याधिकार के प्रति स्वातंत्रता और सहिष्णुकता की देन बुद्ध से आती है। इस दृष्टी से पश्चिमी संस्कृती का दावा कराना वास्तविक निराधार ही है। और प्लेटो या सेंट ऑगस्टाइन और कंफयूशियस यह महिला और कमजोर वर्गा को उनके स्वावतन्त्र धिकार के परिधी के अधिकारो को लेकर सम्राट अशोक से बेहतर सहिष्णुत दिखाई नहीं देते।

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