नालंदा में रिक्शेवाले से ह्वेनसांग का नाम ठीक तरह उच्चारित नहीं हो रहा था। उसनें कहा कि “यहाँ हंसवांग का महल है”। मैं मुस्कुरा दिया, मैंने पूछा कि “जानते हो कौन था यह ह्वेनसांग (हंसवांग)?” अब कि मुस्कुराने की बारी रिक्शावाले की थी बोला “साहब यह तो आप ही जानो, हम तो आपलोगो को जानते हैं। जहाँ बोलते हो घुमा देते हैं”। “लेकिन भाई यह महल नहीं है, म्यूज़ियम है”। रिक्शेवाला फिर बोला “म्यूझिम होगा लेकिनदेखने में तो महल ही लगता है”। रिक्शेवाले नें अपनी विवेचना भरे तर्क सामने रख दिये जब उस म्युझिम को देखा तो किसी महल से कम नही था, वास्तविक आमजनता के अपने तर्क और उसकि आवाज होती है जो अकेडमिक दुनिया के विध्वानों को भी पिछें छोड देते है। चीनी सरकार के सहयोग से निर्मित यह एक भव्य, स्वच्छ तथा सुनियोजित तरीके से निर्मित संग्रहालय है जिसके माध्यम से ह्वेनसांग को याद किया गया है। ह्वेनसांग स्मृति संग्रहालय पहुँच कर मन प्रसन्नता से भर उठा। वह एक यात्री, एक विद्यार्थी, एक शिक्षक और एक इतिहासकार जिसने प्रबुध्द भारत के विरासत को संभालकर चिन ले गया आज उसके सभाले हुये विरासत ने हमें इतना कुछ दिया कि अकल्पनातीत है उसकी स्मृति को ठीक इसी तरह संरक्षित किये जाने की आवश्यकता थी।

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